Monday, August 30, 2010

उनको ये शिकायत है

'उनको ये शिकायत है.. मैं बेवफ़ाई पे नही लिखता,
और मैं सोचता हूँ कि मैं उनकी रुसवाई पे नही लिखता.'

'ख़ुद अपने से ज़्यादा बुरा, ज़माने में कौन है ??
मैं इसलिए औरों की.
. बुराई पे नही लिखता.'

'कुछ तो आदत से मज़बूर हैं और कुछ फ़ितरतों की पसंद है ,
ज़ख़्म कितने भी गहरे हों?? मैं उनकी दुहाई पे नही लिखता.'

'दुनिया का क्या है हर हाल में, इल्ज़ाम लगाती है,
वरना क्या बात?? कि मैं कुछ अपनी.. सफ़ाई पे नही लिखता.'

'शान-ए-अमीरी पे करू कुछ अर्ज़.. मगर एक रुकावट है,
मेरे उसूल, मैं गुनाहों की.. कमाई पे नही लिखता.'

'उसकी ताक़त का नशा.. "मंत्र और कलमे" में बराबर है !!
मेरे दोस्तों!! मैं मज़हब की, लड़ाई पे नही लिखता.'

'समंदर को परखने का मेरा, नज़रिया ही अलग है यारों!!
मिज़ाज़ों पे लिखता हूँ मैं उसकी.. गहराई पे नही लिखता.'

'पराए दर्द को , मैं ग़ज़लों में महसूस करता हूँ ,
ये सच है मैं शज़र से फल की, जुदाई पे नही लिखता.'

'तजुर्बा तेरी मोहब्बत का'.. ना लिखने की वजह बस ये!!
क़ि 'शायर' इश्क़ में ख़ुद अपनी, तबाही पे नही लिखता'

Wednesday, October 21, 2009

ख़ुशी मिल जाये

किताबो के पन्ने पलट के सोचता हूँ
यू पलट जाय मेरी जिंदगी तो क्या बात है
खोआबो में जो रोज मिलते है
जो हकीकत में आये तो क्या बात है
कुछ मतलब के लिए ढूढ़ते है सब मुझको
बिन मतलब जो आये तो क्या बात है
कत्ल करके तो सब ले जायेंगे दिल मेरा
कोई बातो से ले जाये तो क्या बात है
जो शरीफों की शराफत में बात न हो
एक शराबी कह जाये तो क्या बात है
अपने रहने तक तो ख़ुशी दूंगा सबको
जो किसी को मेरी मौत पे ख़ुशी मिल जाये तो क्या बात है
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Saturday, September 19, 2009

Ek din zindagi

Ek din zindagi aise mukam pe pahuch jayegi….

hamari dosti sirf yaadon mein rah jayegi….

har cup coffee yaad doston ki dilayegi….

haaste haste fir aankhein nam ho jayegi….

office ke chamber mein class-room nazar ayegi…

aur chahne par bhi proxy nahi lag payegi....

paisa to bahut hoga ae dost.…

magar usko lutane ki wajah hi kho jayegi….

jee lo khulke kyonki zindagi in palon ko fir se nahi dohrayegi…

बात बहुत मामूली है…..

रात तब नहीं होती जब अंधेरा आ जाता है,
रात तब होती है जब उज़ाला चला जाता है……
बात बहुत मामूली है…..इसिलिये तो खास है…..!

दर्द तब नहीं होता जब कोई भुला देता है,
दर्द तब होता है जब वो याद बहुत आता है……..
बात बहुत मामूली है…..इसिलिये तो खास है…..!

मैं तब नहीं थकता जब बहुत चल लेता हूँ,
मैं बहुत थक जाता हूँ जब खुद को अकेला पाता हूँ…
बात बहुत मामूली है…..इसिलिये तो खास है…..!

ज़ुल्म तब नहीं बढ़ता जब लोग बुरे हो जाते हैं,
ज़ुल्म तब बढ़ जाता है जब अच्छे लोग सो जाते हैं….
बात बहुत मामूली है…..इसिलिये तो खास है…..!

दादाजी

दादाजी और उनकी सायकल के पीछे
बच्चे दौड़ते थे,
झोपड़ी और बंगलेवालों के।
दादाजी की काली बड़ी देह,
दिनों पुरानी खिचड़ी सी दाढ़ी
और सीट के पीछे लटकती हुई
लम्बी लहराती कमीज़।
चौड़ा सफेद पायजामा पहने
वे पेडल मारते चले जाते,
उसी रास्ते,
दिन प्रतिदिन।

बच्चे खुशी से चीखते, चिल्लाते,
"दादाजी! दादाजी!"
और दूर दूर तक
उनका पीछा करते,
जब तक वे थक नहीं जाते,
और एक पैर पर सायकल टिकाकर,
अपनी जेब से रंग बिरंगी पपरमिंट
निकालकर बच्चों को देते।

उन्होंने फिर चलना शुरू ही किया होता,
अतृप्त, वे चीखते, "दादाजी! दादाजी!"
उन्हें चिढ़ाते हुए,
जब तक वे उनके घर से
बहुत दूर तक निकल नहीं जाते।

यह सब भूल गए
और बच्चे अपनी अपनी राह चले गए।
एक दिन अचानक मुझे दादाजी मिल गए,
एक पुरानी ढहती हुई झोपड़ी के सामने
चारपाई पर बैठे हुए।
मैं संकोच करता सा रुका,
"दा दादाजी," मैं हिचकिचाया।
उनके सीधी तरफ लकवा मार गया था
और वे मुझे सुन नहीं पाए।
अपना मुंह उनके कान के करीब लाकर
मैं कुछ ऊंचे से बोला, "दादाजी"

वे धीरे से रुकते रुकते
एक करवट मुड़े,
और एक लाल पपरमिंट
जेब से निकालकर
मेरे हाथ पर रख दी।

- अशोक गुप्ता

* * *

मैं जिन्दगी को जीना सिखाऊँगा !

मैं दो कदम चलता और एक पल को रूकता मगर,इस एक पल में जिन्दगी मुझसे 4 कदम आगे chali जाती,मैं फिर दो कदम चलता और एक पल को रूकता मगर,जिन्दगी मुझसे फिर कदम आगे chali जाती,जिन्दगी को jeet ta देख मैं muskurata और जिन्दगी मेरी mushkurahat पर hairan होती,ये silsila yuhi चलता रहा ,फिर एक दिन मुझको hasta देख एक sitare ने पुछा "तुम harkar भी muskurate हो ,क्या तुम्हे दुःख नहीं होता haar का?" तब मैंने कहा ,मुझे पता है एक ऐसी sarhad aayegi jaha से जिन्दगी तो क्या एक कदम भी आगे नहीं जा payegi और तब जिन्दगी मेरा intzaar karegi और मैं तब भी अपनी raftar से yuhi चलता रुकता wahan pahunchunga .........एक पल ruk कर जिन्दगी की taraf देख कर muskuraoonga,beete safar को एक नज़र देख अपने कदम फिर badhaoonga ,ठीक usi पल मैं जिन्दगी से jeet jaunga,मैं अपनी haar पर muskuraya था और अपनी jeet पर भी muskuraunga और जिन्दगी अपनी jeet पर भी मुस्कुरा पाई थी और अपनी haar पर भी मुस्कुरा पायेगी, बस तभी मैं जिन्दगी को जीना सिखाऊँगा

एक नज़्म

भीड़ में भी जब कोई तुम्हें तन्हा दिखाई दे ,
सबके साथ होकर भी जब कोई अकेला दिखाई दे |
हँसते ही जिसके दिखे एक समंदर सा दर्द का ,
देख जिसे लगे इंतज़ार में एक बुत अपने खुदा के ,
जिसकी सोच समझ जैसे खोई सी लगे ,
जिसकी बातों से ख़ुद तेरी तस्वीर बने ,
बस बिना खोए एक भी पल उसे ,
मेरा नाम लेके मिल लेना ,
वो मैं ना भी हुआ तो कोई ग़म नहीं ,
वो मेरे जैसा हो जाएगा ,
मैं ना सही कोई तो तुम्हे मिल जाएगा |
और अगर याद मेरा नाम भी तब ना आए ,
तो बस अपने नाम से पुकार लेना उसे ,
यक़ीन करो वो मैं हुआ तो एक पल में
पहचान लूँगा , तुम्हे फिर तुमसे माँग लूँगा |